Wednesday, January 4, 2023

नील गगन में

नील गगन में मेघमाल को, 
न्योत बुलाया सावन ने
ढोलक, झाँझ, मंजीरे का 
संगीत सुनाया सावन ने

नदी, ताल, सरवर, पोखर को, 
नवजीवन का दान मिला
इन्द्रधनुष वाले रंगों से 
जीवन को नवगान मिला
तेज तपन से मुक्ति देकर, 
मन हरियाया सावन ने
नील गगन में... 

दादुर, मोर, पपीहे बोले, 
चमके जुगनू टिमटिम से
त्योहारों की बगिया में, 
फल-फूल लगाए रिमझिम के
भाग-दौड़ की धूप-छाँव में, 
मन उमगाया सावन ने
नील गगन में... 

पुरवा पवन चले सावन में, 
घटा उठे काली घनघोर
पुलकित होकर किलकें बालक, 
नाच उठे सबके मन-मोर
खुशियों की किलकारी सुनकर, 
शीश उठाया सावन ने 
नील गगन में... 

व्यथा-कथा का पन्ना-पन्ना, 
बाँच रहे थे जितने जन
गीत और संगीत सुनें तो, 
हर्षित होते सबके मन 
प्यार भरी-सी थपकी देकर, 
थपक सुलाया सावन ने
नील गगन में... 

हरियाली की चूनर ओढ़े, 
छटा अनोखी छाई है
रूप अनूप धारकर धरती, 
मन ही मन इतराई है
अरमानों के झूले ऊपर,
झुलाया सावन ने 
नील गगन में... 

-हरीन्द्र यादव

यह जनता बेचारी

यह जनता बेचारी
अँधियारों में सदा भटकना
है इसकी लाचारी
भीड़, तालियाँ, वोट बनी है, 
यह जनता बेचारी 

पावन स्वेद बहाकर, 
सुन्दर ऊँचे महल बनाएँ
ये बेचारे महलों वाले, 
कभी नहीं हो पाएँ
सत्ता सीढ़ी पुख्ता करने,
ज़ोर लगा कर धाए 
सत्तासीनों के तानों से, 
फिरते अब घबराए
बैठ मुँडेरी उल्लू बोला, 
भाये ना बटमारी
भीड़, तालियाँ... 

रहे जूझती जनता सारी, 
महँगाई की जंग में
चमचों जैसा ही रखते हैं 
नेता इनको संग में 
संरक्षण का खोल चढ़ाकर,
रँगते अपने रंग में
कैसे हो उद्धार भला, 
बतलाओ ऐसे ढंग में 
जिनको चुनकर भेजें, 
वे ही चलवाते दोधारी 
भीड़, तालियाँ... 

काम कराने जब जाते हैं,
नेता से नि होती भेंट
उन्हें देखकर खुल जाते हैं, 
रिश्वत वाले मोटे गेट
मिनटों की दर से तय करते, 
गुर्गे उनसे अपने रेट
वे दारू की नदी बहाते, 
कसमस करता जन का पेट
मेहनत कर रोटी ना पाएँ,
बनते तभी भिखारी
भीड़, तालियाँ... 

-हरीन्द्र यादव 

रेजांगला के शूर वीर

रेजांगला के शूर वीर 
(आल्हा)

मात सरस्वति करूँ स्तुति, देना मेरी कलम सँवार।
रेजांगला की शौर्यकथा को,गाऊँ देना शब्द अपार। 

भारत की सेना अलबेली, गाथा जिसकी अपरम्पार। 
जिसके सम्मुख दुश्मन आते, जाते अपनी हिम्मत हार ।। 

सरहद की रक्षा में रहते, लड़ते रण में सीना तान ।
गाते गाते वन्दे मातरम, दे जाते हैं अपनी जान || 

अमर शहीदों की गाथाएँ,जब-जब गाये हिन्दुस्तान।
तब चुशूल की चौकी वाले, आदर पावें वीर जवान ।। 

वंशी बजैया के छैया हैं, जिनके अदभुत हैं किरदार। 
संकट पड़े देश पै तब ये, लेते चक्र सुदर्शन धार ।। 

देश-भक्त निर्भीक निडर हैं, साहस के होते पर्याय ।
देश धर्म को धरम मानते, सहन नहीं करते अन्याय ॥ 

वीर अहीरों की यशगाथा, मित्रो तुमको आज बतांय। 
शौर्य पराक्रम यदुवीरों का, सुन कर लोग दंग रह जांय ॥

सन बासठ में युद्ध हुआ जब, भारत और चीन दरम्यान । 
धोखेबाज चीन के हाथों, हार गया था हिन्दुस्तान ।। 

रेजांगला  के ऊपर अपनी, दृष्टि गढ़ाये बैठा चीन । 
सोच रहा था आसानी से, अब हम लेंगे इसको छीन ।। 

तेरह कुमाऊँ रेजीमेण्ट की, वहाँ कम्पनी 'सी' तैनात । 
दुर्गम घाटी में वर्फीले, चक्रवात के थे हालात ।। 

सनन सनन सन तेज हवा थी, और बर्फ की थी बौछार' 
बिन साधन के डटे हुए थे, चौकी चुशूल के चौकीदार ॥ 

सम्पर्क कटा था मुख्यालय से, संकट बढ़ा रसद का आय। 
मेजर शैतान सिंह तब बोले, जिसको जाना है वो जाय ।। 

लेकिन वीर अहीरों ने मेजर से कहा सुनो सरदार । 
कायर कौम नहीं यादव की नहीं देश के हम गद्दार ।

कतरा-कतरा हम लोहू का, अपना देंगे यहीं चढ़ाय ।
भुस भर देंगे हम दुश्मन के, देंगे उनकी लाश बिछाय । 

सीना फूल गया मेजर का, भरी गर्व से फिर हुंकार । '
जर्रे- जर्रे गूंज उठी थी, ददा किशन की जय जयकार 

गोलाबारूद और तोप संग, चीनी सेना कई हजार ।
18 नवम्बर स्याह रात थी, उसने किया अचानक वार । 

नर नाहर शैतान सिंह के, भाँप गये दुश्मन की चाल ।
अरि पै टूट पड़े झटके में, सिर पै बाँध लिया था काल । 

तड़ तड़ तड़ तड़ गोली चलती, जाती आसमान को चीर । 
छः  हजार शत्रु के सम्मुख, एक सौ बीस डटे थे वीर 

बड़े लडैया अपने भैया, टूट पड़े थे बन कर काल।
आँखों में अंगारे दहके, ठोंकी सबने अपनी टाल।। 

कटि-कटि रुण्ड गिरे अवनी पर, सिंहों पर था खून सवार।
संग भवानी लड़ी जंग में, लेकर खप्पर और कटार।

एक-एक ने सौ-सौ मारे, दुश्मन गया सनाका खाय । 
गोली खत्म हुई तो बट से, परखच्चे से दिये उड़ाय ॥ 

सत्रह सौ गिन-गिन कर मारे, हा हाकार दिया मचवाय । 
लड़े आखिरी साँस तलक, दुश्मन पीछे दिये हटाय।। 

इतिहास बना के गये स्वयं का, उन वीरों को करूँ प्रणाम।
रण वीरों की यशगाथा को, गाता रहे सदा बलराम ॥
                                  
-बलराम सरस
(एटा)

माहिया

साँकल संकल्पों की
खोल गयीं राहें
मनचाही मंजिल की

-सुरंगमा यादव

ग़ज़ल

मुश्किलें हों राह में क्या डग बढ़ाना छोड़ दें,
आँधियों के खौफ से क्या घर सजाना छोड़ दें।

ज़लज़लों ने धार दरिया की पलट दी खौफ से,
शांत रहकर क्या समंदर ज्वार लाना छोड़ दें।

गमज़दा होकर लवों ने दिल तो पत्थर कर दिया,
लाज़िमी है आँख क्या आँसू बहाना छोड़ दें।

नौनिहालों ने अदब के हर्फ डाले हैं मिटा,
हम भी क्या इस डर से उनको सच पढ़ाना छोड़ दें।

आजकल कातिल छुपे हैं आशिकों के दरमियाँ,
बेवफाई भी है तो क्या दिल लगाना छोड़ दें।

मेरी आंखों की हिरासत में हजारों अश्क हैं,
उनसे कहिए इस कदर यादों में आना छोड़ दें।

हमसे कीजे ऐतिहातन गुफ्तगू भी गौर से,
बाखबर हो कर रहें औ बरगलाना छोड़ दें।

औरतें अश्कों की झीलों से भरी रहती सदा,
कोई मर्दो से कहे ऐसे सताना छोड़ दें।

दिल की दुनिया तो बदलती जा रही है सोम अब,
लफ्ज़ भी खामोश हो लहजों में आना छोड़ दें।

-सोनम यादव 

बेटियाँ

आग से तपते शहर में, मोम जैसी बेटियाँ।
दर्द से मरते शहर में, सोम जैसी बेटियाँ।

बेटियों की हो हिफाज़त, हर गली हर गाँव में,
कोख में कटने न पाएँ, होम जैसी बेटियाँ।

चूम लेंगी अब गगन को, हौसला तो दो इन्हें,
रूढ़ियों में क़ैद हैं क्यों, व्योम जैसी बेटियाँ?

साथ देंगी वक़्त पर ये, तुम भरोसा तो करो,
अड़ रहीं अधिकार खातिर, भोम जैसी बेटियाँ।

बढ़ रहीं हैं मंजिलों की ओर पूरे वेग से,
आग से भी लड़ रही हैं, मोम जैसी बेटियाँ।।

-रघुविंद्र यादव

Monday, January 2, 2023

जगाये उम्मीदें सौ बार

पल-पल छिन-छिन आने वाले
सपनों का आभार
जगाये उम्मीदें सौ बार

कुछ सपने जो बचपन वाले
कुछ सपने जो गोरे काले
कुछ सपनों ने नींद उड़ाई
कुछ सपने जो उलझन डाले
इंद्र धनुष की लिए अर्गला
सप्त रंग के द्वार
जगाये उम्मीदें सौ... 

जिन सपनों ने नैना खोले
जिन सपनों ने नव रस घोले
ठंडी छाँव लिए छंदों की
जिन सपनों से अंतस डोले
चिर साहित्य साधना के सुर
गीतों की बौछार
जगाये उम्मीदें सौ ... 

नित निज मन में भाव जगाएँ
पीड़ाओं से ताल मिलाएँ
सुर संगम की प्यास लिए उर
अश्रु कलश अँखियाँ ढलकाएँ
नवगीतों की सरस कामना
लेती है आकार
जगाये उम्मीदें सौ ... 

सरिता नदी समंदर होना
इन सपनों का जादू टोना
प्रीति रीति अरु हार जीत सॅंग
हृदय पटल पर अंकुर बोना
छंद सवैया गीत माहियों
की होगी गुंजार
जगाती उम्मीदें सौ ... 

-सोनम यादव

Sunday, January 1, 2023

दिसंबर में पूछेंगे

मुबारक हो तुमको नया साल यारो 
मिलाओ नए वक़्त से ताल यारो 

कहीं कुछ है बेहतर कहीं कुछ है बदतर 
कोई खुश तो है कोई बेहाल यारो 

जुड़ी और इक याद एल्बम में  मेरी
घटा उम्र से और इक साल यारो 

अभी तो है जोशे - जुनूँ तुम पे तारी   
अभी तुम मनाओ नया साल यारो 

कलैंडर ही बदला कि क़िस्मत भी बदली 
दिसंबर में पूछेंगे फिर हाल यारो 
                     
 -आलोक यादव

Friday, December 30, 2022

नव वर्ष

नव किरणों को कौन बिखेरे 
लिए रेशमी डोर 
वर्ष नव, बिखराये नव भोर। 

संदेशे ले आखर-आखर 
दीप जले हैं देहरी बाखर 
फूल, कली, भँवरे, गुलदस्ते 
मीत, सखा सब मिलकर हँसते 
मलय समीर बहे मनभावन 
महकाये चहुँ ओर 
वर्ष नव, बिखराये नव भोर। 

अंबर ने फैलाई चादर 
कुहरे ने ढलकाई गागर 
झाँके फागुन मन भरमाये 
रँग अबीर खुशबू फैलाये 
नव पल्लव अभिनंदन करते 
नाच रहे मन मोर 
वर्ष नव, बिखराय नव भोर। 

सभी ज्ञान का दीप जलाएँ 
मानवता के भाव जगाएँ 
धानी चूनर  हो वसुधा की
सब मिलजुल कर धरा सजाएँ 
वर्ष, हर्ष मय हो सब जन को 
स्वर्णिम सबकी भोर 
वर्ष नव, बिखराय नव भोर।

-सोनम यादव

Thursday, December 29, 2022

रूठो पर

सुनो श्रद्धा !
तुम रूठ गईं 
रूठना अच्छी बात है 
रूठना ही तो  
मैत्री की है सर्वश्रेष्ठ 
चैतन्य अवस्था
रूठना  ही तो है 
नैकट्य के लिए विकलता
रूठना  ही तो है
अभिव्यक्ति का
आधिकारिक व्यतीकरण
मैत्री के लिए
प्रस्फुटन या फैलाव
रूठना ही तो है
बीज की आंतरिक रूष्टता 
और
विकलता से ही तो 
क्षय होती है
धरा और बीज के बीच की 
अवरोधक भित्ति
और
उत्पत्ति होती है
बीजों की अक्षय और अनंत
निधि की
रूठना ही तो है 
मैत्री का नवीनीकरण है
अटूट विश्वास 
होता है संरक्षित
रूठने में ही 
और समर्पण भी
रूठना ईश्वरीय गुण है
राधा का कृष्ण से रूठना
कृष्ण का
यशोदा को रूठकर दिखाना
ईश्वरीय गुण ही तो है
रूठना ऐसा घूँट है
उस कड़वी औषधि का 
जिसमें पुनर्नवा 
होती है मैत्री 
लेकिन 
आवश्यक होता है
मात्रा का नियतन
रूठने की सदाश्यता के लिए 
मात्रा में परिवर्तन होते ही    
परिवर्तित हो जाती है
 श्रद्धा, श्राद्ध में
सुनो श्रद्धा !
रूठो पर 
मात्रा का ध्यान रहे  
मानक के साथ रूठो
तुम्हारा रूठना भी 
बनेगा
एक मानक
एक कथानक
एक उदाहरण
सुनो श्रद्धा सुनो! 
रूठो ! 
पर... 

 -महाराज सिंह यादव