Wednesday, January 4, 2023

बेटियाँ

आग से तपते शहर में, मोम जैसी बेटियाँ।
दर्द से मरते शहर में, सोम जैसी बेटियाँ।

बेटियों की हो हिफाज़त, हर गली हर गाँव में,
कोख में कटने न पाएँ, होम जैसी बेटियाँ।

चूम लेंगी अब गगन को, हौसला तो दो इन्हें,
रूढ़ियों में क़ैद हैं क्यों, व्योम जैसी बेटियाँ?

साथ देंगी वक़्त पर ये, तुम भरोसा तो करो,
अड़ रहीं अधिकार खातिर, भोम जैसी बेटियाँ।

बढ़ रहीं हैं मंजिलों की ओर पूरे वेग से,
आग से भी लड़ रही हैं, मोम जैसी बेटियाँ।।

-रघुविंद्र यादव

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