Thursday, December 29, 2022

रूठो पर

सुनो श्रद्धा !
तुम रूठ गईं 
रूठना अच्छी बात है 
रूठना ही तो  
मैत्री की है सर्वश्रेष्ठ 
चैतन्य अवस्था
रूठना  ही तो है 
नैकट्य के लिए विकलता
रूठना  ही तो है
अभिव्यक्ति का
आधिकारिक व्यतीकरण
मैत्री के लिए
प्रस्फुटन या फैलाव
रूठना ही तो है
बीज की आंतरिक रूष्टता 
और
विकलता से ही तो 
क्षय होती है
धरा और बीज के बीच की 
अवरोधक भित्ति
और
उत्पत्ति होती है
बीजों की अक्षय और अनंत
निधि की
रूठना ही तो है 
मैत्री का नवीनीकरण है
अटूट विश्वास 
होता है संरक्षित
रूठने में ही 
और समर्पण भी
रूठना ईश्वरीय गुण है
राधा का कृष्ण से रूठना
कृष्ण का
यशोदा को रूठकर दिखाना
ईश्वरीय गुण ही तो है
रूठना ऐसा घूँट है
उस कड़वी औषधि का 
जिसमें पुनर्नवा 
होती है मैत्री 
लेकिन 
आवश्यक होता है
मात्रा का नियतन
रूठने की सदाश्यता के लिए 
मात्रा में परिवर्तन होते ही    
परिवर्तित हो जाती है
 श्रद्धा, श्राद्ध में
सुनो श्रद्धा !
रूठो पर 
मात्रा का ध्यान रहे  
मानक के साथ रूठो
तुम्हारा रूठना भी 
बनेगा
एक मानक
एक कथानक
एक उदाहरण
सुनो श्रद्धा सुनो! 
रूठो ! 
पर... 

 -महाराज सिंह यादव

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