Wednesday, January 4, 2023

यह जनता बेचारी

यह जनता बेचारी
अँधियारों में सदा भटकना
है इसकी लाचारी
भीड़, तालियाँ, वोट बनी है, 
यह जनता बेचारी 

पावन स्वेद बहाकर, 
सुन्दर ऊँचे महल बनाएँ
ये बेचारे महलों वाले, 
कभी नहीं हो पाएँ
सत्ता सीढ़ी पुख्ता करने,
ज़ोर लगा कर धाए 
सत्तासीनों के तानों से, 
फिरते अब घबराए
बैठ मुँडेरी उल्लू बोला, 
भाये ना बटमारी
भीड़, तालियाँ... 

रहे जूझती जनता सारी, 
महँगाई की जंग में
चमचों जैसा ही रखते हैं 
नेता इनको संग में 
संरक्षण का खोल चढ़ाकर,
रँगते अपने रंग में
कैसे हो उद्धार भला, 
बतलाओ ऐसे ढंग में 
जिनको चुनकर भेजें, 
वे ही चलवाते दोधारी 
भीड़, तालियाँ... 

काम कराने जब जाते हैं,
नेता से नि होती भेंट
उन्हें देखकर खुल जाते हैं, 
रिश्वत वाले मोटे गेट
मिनटों की दर से तय करते, 
गुर्गे उनसे अपने रेट
वे दारू की नदी बहाते, 
कसमस करता जन का पेट
मेहनत कर रोटी ना पाएँ,
बनते तभी भिखारी
भीड़, तालियाँ... 

-हरीन्द्र यादव 

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