नील गगन में मेघमाल को,
न्योत बुलाया सावन ने
ढोलक, झाँझ, मंजीरे का
संगीत सुनाया सावन ने
नदी, ताल, सरवर, पोखर को,
नवजीवन का दान मिला
इन्द्रधनुष वाले रंगों से
जीवन को नवगान मिला
तेज तपन से मुक्ति देकर,
मन हरियाया सावन ने
नील गगन में...
दादुर, मोर, पपीहे बोले,
चमके जुगनू टिमटिम से
त्योहारों की बगिया में,
फल-फूल लगाए रिमझिम के
भाग-दौड़ की धूप-छाँव में,
मन उमगाया सावन ने
नील गगन में...
पुरवा पवन चले सावन में,
घटा उठे काली घनघोर
पुलकित होकर किलकें बालक,
नाच उठे सबके मन-मोर
खुशियों की किलकारी सुनकर,
शीश उठाया सावन ने
नील गगन में...
व्यथा-कथा का पन्ना-पन्ना,
बाँच रहे थे जितने जन
गीत और संगीत सुनें तो,
हर्षित होते सबके मन
प्यार भरी-सी थपकी देकर,
थपक सुलाया सावन ने
नील गगन में...
हरियाली की चूनर ओढ़े,
छटा अनोखी छाई है
रूप अनूप धारकर धरती,
मन ही मन इतराई है
अरमानों के झूले ऊपर,
झुलाया सावन ने
नील गगन में...
-हरीन्द्र यादव
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