मुश्किलें हों राह में क्या डग बढ़ाना छोड़ दें,
आँधियों के खौफ से क्या घर सजाना छोड़ दें।
ज़लज़लों ने धार दरिया की पलट दी खौफ से,
शांत रहकर क्या समंदर ज्वार लाना छोड़ दें।
गमज़दा होकर लवों ने दिल तो पत्थर कर दिया,
लाज़िमी है आँख क्या आँसू बहाना छोड़ दें।
नौनिहालों ने अदब के हर्फ डाले हैं मिटा,
हम भी क्या इस डर से उनको सच पढ़ाना छोड़ दें।
आजकल कातिल छुपे हैं आशिकों के दरमियाँ,
बेवफाई भी है तो क्या दिल लगाना छोड़ दें।
मेरी आंखों की हिरासत में हजारों अश्क हैं,
उनसे कहिए इस कदर यादों में आना छोड़ दें।
हमसे कीजे ऐतिहातन गुफ्तगू भी गौर से,
बाखबर हो कर रहें औ बरगलाना छोड़ दें।
औरतें अश्कों की झीलों से भरी रहती सदा,
कोई मर्दो से कहे ऐसे सताना छोड़ दें।
दिल की दुनिया तो बदलती जा रही है सोम अब,
लफ्ज़ भी खामोश हो लहजों में आना छोड़ दें।
-सोनम यादव
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