Wednesday, December 28, 2022

ग़ज़ल


धैर्य का ज्वालामुखी धधका है फूटेगा ज़रूर
सुर्ख लावा वह चला तो बाँध टूटेगा ज़रूर

आग का दरिया निगल जायेगा यूँ सब कुछ मगर,
राख का एक ढेर पीछे फिर भी छूटेगा ज़रूर 

सच को इतना जानने से पूर्व यह भी जान लो,
सत्य का अहसास मन का चैन लूटेगा ज़रूर

खोजने की ये प्रवृति गर यूँ ही बढ़ती रही,
खुद को जब खोजोगे तो घरबार छूटेगा ज़रूर

ये क्षणिक खुशियाँ मिली सौभाग्यवश जो ख़्वाब से,
ख्वाब तो बस ख्वाब है ये ख्वाब टूटेगा ज़रूर


-राहुल यादव

-1007,अन्ता पाडा,मथुरा

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