आओ चाँँद तारे तोड़ लें
धरती का रस निचोड़ लें
प्यारी प्यारी इस जमीन से
आसमान को भी जोड़ लें
भेदभाव प्रचंड हो गए
मोती खंड खंड हो गए
जो थे उनको प्यारे जान से
वो भी ना पसंद हो गए
फिर से मन की जंग जीत लें
आओ मन के मोती जोड़ लें
प्रेम धार कुंद हो गई,
बोलचाल बंद हो गई
भ्रम के भाव जागने लगे
कशमकश बुलंद हो गई
दंभी चादरें उतारकर
प्रेम का लिवास ओढ लें
राह में अवरोध हो बड़ा,
क्यों न हिमाचल ही हो खड़ा
चोटियाँ हो आसमान सी
चाहे कोसों दूर हो धरा
पर्वतों को झुकना पड़ेगा
आओ हौसले बटोर लें
यह धरा है स्वाभिमान की,
मीरा सूर रसखान की
महावीर रामकृष्ण की
गौतम बुद्ध भगवान की
समंदर भरा है प्रेम का
आओ उसमें दिल को वोर लें
आओ चांद तारे तोड़ लें
धरती का रस निचोड़ लें
-सत्येन्द्र निर्झर
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