Wednesday, December 28, 2022

आओ चाँद तारे तोड़ लें

आओ चाँँद तारे तोड़ लें 
धरती का रस निचोड़ लें
 प्यारी प्यारी इस जमीन से 
आसमान को भी जोड़ लें 

भेदभाव प्रचंड हो गए 
मोती खंड खंड हो गए 
जो थे उनको प्यारे जान से
वो भी ना पसंद हो गए 
फिर से मन की जंग जीत लें 
आओ मन के मोती जोड़ लें

प्रेम धार कुंद हो गई, 
बोलचाल बंद हो गई 
भ्रम के  भाव जागने लगे
कशमकश बुलंद हो गई 
दंभी  चादरें उतारकर  
प्रेम का लिवास ओढ लें 

राह में अवरोध हो बड़ा, 
क्यों न हिमाचल ही हो खड़ा 
चोटियाँ हो आसमान सी
चाहे कोसों दूर हो धरा 
पर्वतों को झुकना पड़ेगा 
आओ हौसले बटोर लें 

यह धरा है स्वाभिमान की, 
मीरा सूर  रसखान की 
 महावीर रामकृष्ण की
 गौतम बुद्ध भगवान की 
 समंदर भरा है प्रेम का 
आओ उसमें  दिल को वोर लें
 आओ चांद तारे तोड़ लें
 धरती का रस निचोड़ लें 

 -सत्येन्द्र निर्झर
                    

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