व्याकुल विहग विटप
उपवन के
पीपल की आँखों में पानी
देख बबूलों की मनमानी
जल से नैन भरे
जामुन के
सुमनों की अब दाल न गलती
सुबह शाम खारों की चलती
कोमल बदन छिले
कलियन के
सिंह की तरह दहाड़ रहा है
गीदड़ चमन उजाड़ रहा है
लव पर मीठे बोल
अमन के
कौवे बैठाए सिरहाने
कोयल के गाने पर ताने
वात करें मोरों
से तन के
यह माली अपनी ही ताने
बूढ़े बरगद की नही माने
निर्झर गुम सुख चैन
चमन के
-सत्येन्द्र निर्झर
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