Wednesday, December 28, 2022

पंछी बोला

संध्या की उदास बेला, 
सूखे तरुपर पंछी बोला!

आँखें खोलीं आज प्रथम
जग का वैभव लख भूला मन!
सोचा उसने-भर दूँ अपने 
मादक स्वर से निखिल गगन !
दिन भर भटक-भटक कर नभ में 
मिली उसे जब शान्ति नहीं,
बैठ गया तरु पर सुस्ताने, 
बैठ गया होकर उन्मन !
देखा अपनी ही ज्वाला में
झुलस गई तरु की काया;
मिला न उसे स्नेह जीवन में,
मिली न कहीं तनिक छाया
सोच रहा- सुख जब न विश्व में, 
व्यर्थ मिला ऐसा चोला
संध्या की उदास बेला, 
सूखे तरु पर पंछी बोला।

देखा था कलियों को प्रातः 
हँसते ही उपवन में आज;
कैसा मादक स्वर भरता था 
मधुपों का तब जुड़ा समाज
देखा मलय पवन को भरते 
प्रतिपल सौरभ से झोली,
अवनि हरित थी, गगनांगन में 
धमित मोद था रहा विराज
प्रथम-प्रथम देखा था जैसा,
भूला था जिसको लख कर;
रहा न वही रूप जगती का,
देखा दिनभर अनुभव कर
सोच रहा वह- हँसी-खुशी में 
किसने विष लाकर घोला!
संध्या की उदास बेला, 
सूखे तरु पर पंछी बोला!

नभ में एक तारिका जलती, 
धूल-धूसरित गगन महान!
विहग-यूथ नीड़ों को जाते 
लेकर कोई व्यथा अजान!
जीवन की ज्वाला की यादें 
रह-रह विकल बनाती हैं,
मानस में हलचल फैली है, 
उठता है भीषण तूफान
कहता है समीर कुछ जग से,
कहता कुछ नभ सीमा-हीन!
संध्या की उदास छाया में
भटक रहा कोई पथ-हीन
सोच रहा डाली पर पंछी, 
एक शुष्क पत्ता डोला
संध्या की उदास बेला, 
सूखे तरु पर पंछी बोला।

-रामावतार यादव शक्र
-नवम्बर, 1941 ई.

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