संध्या की उदास बेला,
सूखे तरुपर पंछी बोला!
आँखें खोलीं आज प्रथम
जग का वैभव लख भूला मन!
सोचा उसने-भर दूँ अपने
मादक स्वर से निखिल गगन !
दिन भर भटक-भटक कर नभ में
मिली उसे जब शान्ति नहीं,
बैठ गया तरु पर सुस्ताने,
बैठ गया होकर उन्मन !
देखा अपनी ही ज्वाला में
झुलस गई तरु की काया;
मिला न उसे स्नेह जीवन में,
मिली न कहीं तनिक छाया
सोच रहा- सुख जब न विश्व में,
व्यर्थ मिला ऐसा चोला
संध्या की उदास बेला,
सूखे तरु पर पंछी बोला।
देखा था कलियों को प्रातः
हँसते ही उपवन में आज;
कैसा मादक स्वर भरता था
मधुपों का तब जुड़ा समाज
देखा मलय पवन को भरते
प्रतिपल सौरभ से झोली,
अवनि हरित थी, गगनांगन में
धमित मोद था रहा विराज
प्रथम-प्रथम देखा था जैसा,
भूला था जिसको लख कर;
रहा न वही रूप जगती का,
देखा दिनभर अनुभव कर
सोच रहा वह- हँसी-खुशी में
किसने विष लाकर घोला!
संध्या की उदास बेला,
सूखे तरु पर पंछी बोला!
नभ में एक तारिका जलती,
धूल-धूसरित गगन महान!
विहग-यूथ नीड़ों को जाते
लेकर कोई व्यथा अजान!
जीवन की ज्वाला की यादें
रह-रह विकल बनाती हैं,
मानस में हलचल फैली है,
उठता है भीषण तूफान
कहता है समीर कुछ जग से,
कहता कुछ नभ सीमा-हीन!
संध्या की उदास छाया में
भटक रहा कोई पथ-हीन
सोच रहा डाली पर पंछी,
एक शुष्क पत्ता डोला
संध्या की उदास बेला,
सूखे तरु पर पंछी बोला।
-रामावतार यादव शक्र
-नवम्बर, 1941 ई.
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