किया हर फ़ैसला ख़ुद सुना कुछ भी नहीं
हमें भी ज़िद रही और कहा कुछ भी नहीं
बिछड़ जाने का तेरे बहुत डर था हमें
हुआ कुछ भी नहीं पर रहा कुछ भी नहीं
वफ़ा की राह में यूँ हुई है रहज़नी
गया कुछ भी नहीं और बचा कुछ भी नहीं
नसीहत की थी उसने मुझे जाते हुए
तेरा कुछ भी नहीं और मेरा कुछ भी नहीं
दिए हैं ज़ख़्म तुमने मगर उनके लिए
दवा कुछ भी नहीं है दुआ कुछ भी नहीं
मुहब्बत है तिजारत तो फिर ‘आलोक’ जी
वफ़ा कुछ भी नहीं और जफ़ा कुछ भी नहीं
-आलोक यादव
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