Thursday, December 29, 2022

ग़ज़ल

किया हर फ़ैसला ख़ुद सुना कुछ भी नहीं 
हमें भी ज़िद रही और कहा कुछ भी नहीं

बिछड़ जाने का तेरे बहुत डर था हमें
हुआ कुछ भी नहीं पर रहा कुछ भी नहीं

वफ़ा की राह में यूँ हुई है रहज़नी
गया कुछ भी नहीं और बचा कुछ भी नहीं

नसीहत की थी उसने मुझे जाते हुए 
तेरा कुछ भी नहीं और मेरा कुछ भी नहीं

दिए हैं ज़ख़्म तुमने मगर उनके लिए 
दवा कुछ भी नहीं है दुआ कुछ भी नहीं

मुहब्बत है तिजारत तो फिर ‘आलोक’ जी
वफ़ा कुछ भी नहीं और जफ़ा कुछ भी नहीं  


-आलोक यादव 



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