सिसक झोपड़ी चुप सोती है
मानवता कराहती रोती है
सेठों की है महल अटारी
चले सड़क पर मोटर गाड़ी
कीमत नहीं अन्नदाता उस
निस्पृह दीन-किसान की
सम्हल-सम्हल कर पग रखना है,
दुनिया बे-ईमान की...
स्वार्थी भूले भगत सिंह को
आजादी के चरण-चिह्न को
कौन चन्द्रशेखर न जानना
निज स्वार्थ को बड़ा मानना
स्मृति में नहीं दिखती है,
कथा शुद्ध बलिदान की
सम्हल-सम्हल कर पग रखना है,
दुनिया बे-ईमान की...
खाओ-पियो मौज करो बस
निचोड़ लो चालाकी से रस
कल-पुर्जो का कलयुग ठहरा
यन्त्र-भावना निहित गहरा
पूजा होती नहीं हृदय से,
कभी यहाँ भगवान की
सम्हल-सम्हल कर पग रखना है,
दुनिया बे-ईमान की ...
सतत युद्ध की है विभीषिका
शांत न चीन,पाक-अमेरिका
विश्व-शांति की धुँधली रेखा
कब मिट जावे शंकित लेखा
नहीं कुशलता भाषित होती,
मानव-पावन प्राण की
सम्हल-सम्हल कर पग रखना है,
दुनिया बे-ईमान की...
था सुकरात हेतु विष-प्याला
ईसा हेतु क्रास की माला
गाँधी की छाती पर गोली
यहाँ सत्य की हरदम होली
कौड़ी की इज्जत न यहाँ है,
सच्चे शुचि इंसान की
सम्हल-सम्हल कर पग रखना है,
दुनिया बे-ईमान की...
-शिशुपाल सिंह यादव मुकुंद
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