लानत रख लो जन गण मन की
राजा निकले पाथर तुम
साँसें बन्द पड़ीं हैं जितनी
उन सबके हत्यारे हो
दृश्य भयावह टर सकते थे
लेकिन तुम कब टारे हो
संसाधन की डोर डाढ़ में
बैठे रहे दबाकर तुम
बेशर्मी भी शर्मसार है
इतने हुए अमानव हो
चोला ओढ़े हो मानुष का
लेकिन घातक दानव हो
अफरोगे कब बोलो आखिर
कितने मुण्ड चबाकर तुम
हाहाकार मचा हर घर में
रेंगी जूँ कब कानों पर
मला अँधेरा तुमने सबकी
आँखों और विहानों पर
आत्म मुग्धता नहीं छूटती
बैठै साँस ठगाकर तुम
-अनामिका सिंह
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