धरती का भगवान, हुए क्यों
सपने लहूलुहान
नीति नियंता कभी न अफरे
जितने भी आये
तारणहार तुम्हारे हमने
छद्म गीत गाये
सत्ता की महराब, पीर क्या
समझें छप्पर-छान
खड़ी फसल चौपाये चरते
दोपाये लूटें
विपदाएँ कुण्ठाएँ छप्पर-
छानी पर टूटें
खेत-किसानी वाला भारत
भूखा मरे किसान
जन की सत्ता खेतों में कब
चलकर आएगी
सुबके हुए कृषक को आकर
न्याय दिलाएगी
एक छलावा कृषक हितों में
पूँजी का अनुदान
-अनामिका सिंह
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