देख रहा हूँ
तटबन्धों-का टूटना
दरक रहे हैं जो तल वे धरती - के हैं
सच में तो हम फँसे तलछटों के नीचे हैं
या कह लें आसीन जहाँ हम इस पल हैं
जाने कितने आधारों का सम्बल हैं
यह विश्वास
शिला में सोते फूटना
देख रहा हूँ
तटबन्धों-का टूटना
पीड़ाएँ न सूखा हैं न पानी हैं
बाधाएँ न मूरख हैं न ज्ञानी हैं
अक्सर तय कर पाना मुश्किल होता है
क्या सुख से क्या दुःख से हासिल होता है
सब कुछ जैसे
न था पास वह छूटना !
देख रहा हूँ
तटबन्धों-का टूटना
-अश्विनी कुमार विष्णु
तटबन्धों-का टूटना
दरक रहे हैं जो तल वे धरती - के हैं
सच में तो हम फँसे तलछटों के नीचे हैं
या कह लें आसीन जहाँ हम इस पल हैं
जाने कितने आधारों का सम्बल हैं
यह विश्वास
शिला में सोते फूटना
देख रहा हूँ
तटबन्धों-का टूटना
पीड़ाएँ न सूखा हैं न पानी हैं
बाधाएँ न मूरख हैं न ज्ञानी हैं
अक्सर तय कर पाना मुश्किल होता है
क्या सुख से क्या दुःख से हासिल होता है
सब कुछ जैसे
न था पास वह छूटना !
देख रहा हूँ
तटबन्धों-का टूटना
-अश्विनी कुमार विष्णु
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