Sunday, December 17, 2017

अपनापन हम खो बैठे


धन औ पद की चकाचौंध में
अपनापन हम खो बैठे
क्या खोया है क्या पाया है
सोच रहे बैठे- बैठे

पीपल नीम आम काटे
कंकरीट के महल बनाये
बंगले  कहाँ बगीचे वाले 
फ्लैट अधिकतर को भाये
गूलर फूल हुआ अपनापन
पुत्र पिता से हैं ऐंठे

नहीं बोलते मोर पपीहा
कागा कोयल गौरैया
कोलाहल है शहर गाँव तक
डिस्को डी०जे० है भइया
दंग मृदंग कहानी कविता
आज सभी से रूठे

दूरी हुई दिलों की लम्बी
आपस मे रहती अनबन
जिसके मन की नहीं करो
तो वही दिखाता है ठनगन
बाबा के माथे पर बल है
रिश्ते क्यों गैंठे-गैंठे
 
-जयराम जय कानपुर

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