माँ लीपती थी आँगन पीली मिट्टी से
आँगन खुशबू-खुशबू हो जाता था
एक बार में जितना बाँहों में आता था
उतना आँगन माँ के हाथों रँग जाता था
इस तरह उसे लिक्खा करती थी माँ
आँगन के चेहरे अपनी उँगलियों की छुअन
लीप-पोत कर खड़िया से फिर
माँ चौके में फूल खिलाती थी
मोर नचाती थी
वो जिन्दा आँगन
पल-पल करता था बातें चपल-चपल
उस कच्चे आँगन के संग
मेरा पक्का रिश्ता था
अब रोज देखता हूँ
मैं अपने फ्लैट के पक्के फर्श को
वाइपर के दाँतों से जख्मी होते हुए
चमकता तो बहुत है मगर
मुझसे गुफ्तगू नहीं करता
मैंने भी
कभी उसको छुआ ही नहीं उँगलियों से
उस कच्चे आँगन के फूलों से
मोरों से भी
अपना एक रिश्ता था
इस पक्के आँगन के इंसानों से भी
अजनबियत रिसती है।
-रवि यादव
आँगन खुशबू-खुशबू हो जाता था
एक बार में जितना बाँहों में आता था
उतना आँगन माँ के हाथों रँग जाता था
इस तरह उसे लिक्खा करती थी माँ
आँगन के चेहरे अपनी उँगलियों की छुअन
लीप-पोत कर खड़िया से फिर
माँ चौके में फूल खिलाती थी
मोर नचाती थी
वो जिन्दा आँगन
पल-पल करता था बातें चपल-चपल
उस कच्चे आँगन के संग
मेरा पक्का रिश्ता था
अब रोज देखता हूँ
मैं अपने फ्लैट के पक्के फर्श को
वाइपर के दाँतों से जख्मी होते हुए
चमकता तो बहुत है मगर
मुझसे गुफ्तगू नहीं करता
मैंने भी
कभी उसको छुआ ही नहीं उँगलियों से
उस कच्चे आँगन के फूलों से
मोरों से भी
अपना एक रिश्ता था
इस पक्के आँगन के इंसानों से भी
अजनबियत रिसती है।
-रवि यादव
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