ढीठ बड़ो जसुदा को लला, भरी भीर में नैन लड़ाबतु है
आली कहूँ किनसों मन की, मोपै साँबरो रंग चढ़ाबतु है
हौं कहि हारी बिथा सिग सौं, पै कोऊ न धीर बँधाबतु है
जानै कौन सी वो चटसार पढ़ो, सबै उलटो पहाड़ो पढ़ाबतु है।
-बदनसिंह यादव मस्ताना
आली कहूँ किनसों मन की, मोपै साँबरो रंग चढ़ाबतु है
हौं कहि हारी बिथा सिग सौं, पै कोऊ न धीर बँधाबतु है
जानै कौन सी वो चटसार पढ़ो, सबै उलटो पहाड़ो पढ़ाबतु है।
-बदनसिंह यादव मस्ताना
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