Sunday, January 8, 2017

बेटियाँ

हर घड़ी विश्वास पैदा कर रही हैं बेटियाँ
नित नयी ऊँची उड़ाने भर रही हैं बेटियाँ

खोल कर आँखें उन्हें ऊँचा जरा आकाश दो
अब नहीं बेटों से कुछ कमतर रही हैं बेटियाँ

हर घड़ी बनकर सहारा साथ हैं माँ-बाप के
है गलत ये की मुसीबत सर रही हैं बेटियाँ

लाडली माँ-बाप की जायेगी इक दिन छोड़कर
ज़िन्दगी भर कब किसी के घर रही हैं बेटियाँ

मोल से इनके न जाने लोग क्यों अनजान हैं
कोख में ही आज भी क्यों मर रही हैं बेटियाँ?

-हीरालाल यादव

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