शीत लहर चलने लगी, चुभने लगी बयार
फिर से सरदी ने किया, सारा बंटाधार
विधना ने है छल किया, हल्कू सँग आघात
देखो फिर है आ गयी, वही पूस की रात
नही वसन तन पर जुरे, ना घर भूँजी भाँग
नहीं बुझाये अब बुझे, लगी पेट की आग
बेटी घर में हो चली, है शादी के योग
ना घर में है दामड़ी, कैसा यह संजोग
धनिया सोचे रात-दिन, नहीं मुकद्दर साथ
कैसे पीले होयँगे, झुनियां के अब हाथ
नहीं फसल है खेत में, नहीं जेब में दाम
सिर के ऊपर है लदा, देखो कर्ज तमाम
अन्दर-अन्दर सालती,यह मौसम की मार
नित्य सबेरे पीटता, साहू घर का द्वार
कासों निज बिपदा कहूँ, कासों करूँ रि बात
काटे अब कटती नहीं, यह जाड़े की रात
-राम सागर यादव
फिर से सरदी ने किया, सारा बंटाधार
विधना ने है छल किया, हल्कू सँग आघात
देखो फिर है आ गयी, वही पूस की रात
नही वसन तन पर जुरे, ना घर भूँजी भाँग
नहीं बुझाये अब बुझे, लगी पेट की आग
बेटी घर में हो चली, है शादी के योग
ना घर में है दामड़ी, कैसा यह संजोग
धनिया सोचे रात-दिन, नहीं मुकद्दर साथ
कैसे पीले होयँगे, झुनियां के अब हाथ
नहीं फसल है खेत में, नहीं जेब में दाम
सिर के ऊपर है लदा, देखो कर्ज तमाम
अन्दर-अन्दर सालती,यह मौसम की मार
नित्य सबेरे पीटता, साहू घर का द्वार
कासों निज बिपदा कहूँ, कासों करूँ रि बात
काटे अब कटती नहीं, यह जाड़े की रात
-राम सागर यादव
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