दूर तक मरहला नहीं होता
हल कोई मसअला नहीं होता
चाँद सा तू कि चाँद तुझ जैसा
रात भर फैसला नहीं होता
कब तेरे अक्स ने जहन छोड़ा
कब तसरा चोंचला नहीं होता
तुम मुझे और दूर लगते हो
जब कोई फासला नहीं होता
क्यों तेरे नाम पर उछलता यूँ
दिल अगर बावला नहीं होता
-अर्जुन सिंह यादव लिहाज़
हल कोई मसअला नहीं होता
चाँद सा तू कि चाँद तुझ जैसा
रात भर फैसला नहीं होता
कब तेरे अक्स ने जहन छोड़ा
कब तसरा चोंचला नहीं होता
तुम मुझे और दूर लगते हो
जब कोई फासला नहीं होता
क्यों तेरे नाम पर उछलता यूँ
दिल अगर बावला नहीं होता
-अर्जुन सिंह यादव लिहाज़
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