Monday, December 26, 2016

एक आँचल कहीं खो गया है

एक आँचल कहीं खो गया है
चाँदनी तो नहीं हो गया है

लाल होने लगी झील दिन की
कौन मेहँदी यहाँ धो गया है

लाख नज़रें उसे जानती हैं
कौन कहता है- वह खो गया है

बदलियों की लटें ओढ़कर क्या
आपका रूप ही सो गया है

मन जला तो अधर मुस्कुराये
लो कि तन आरती हो गया है

-रमेश यादव
[ वर्ष 1974 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित गजल ] 

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