एक आँचल कहीं खो गया है
चाँदनी तो नहीं हो गया है
लाल होने लगी झील दिन की
कौन मेहँदी यहाँ धो गया है
लाख नज़रें उसे जानती हैं
कौन कहता है- वह खो गया है
बदलियों की लटें ओढ़कर क्या
आपका रूप ही सो गया है
मन जला तो अधर मुस्कुराये
लो कि तन आरती हो गया है
-रमेश यादव
[ वर्ष 1974 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित गजल ]
चाँदनी तो नहीं हो गया है
लाल होने लगी झील दिन की
कौन मेहँदी यहाँ धो गया है
लाख नज़रें उसे जानती हैं
कौन कहता है- वह खो गया है
बदलियों की लटें ओढ़कर क्या
आपका रूप ही सो गया है
मन जला तो अधर मुस्कुराये
लो कि तन आरती हो गया है
-रमेश यादव
[ वर्ष 1974 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित गजल ]
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