Sunday, July 31, 2016

रोटी

 -रामलखन यादव

गिरने से पहले वह झुलस रही थी
किसी ने जो उछाली थी रोटी
वह एक नंगे पेट पर झूल रही थी

वह खड़ा रहा रात भर
रोटी के इंतजार में
मगर वह झूल रही थी

उसने रोटी नहीं खाई
पानी नहीं पिया

वह धूल में पड़ा हुआ देख रहा था
उसके हाथ में झूलती हुई रोटी को

अब तक हिल रही है सारी सृष्टि !!


-रामलखन यादव
(आजकल, जुलाई 1994 से साभार)

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