ग़म पे औरों के कभी अश्क़ बहाया तो करो
आदमी होने का कुछ फ़र्ज़ निभाया तो करो
तल्ख़ हालात से दो चार है आलम सारा
सूखे होंठों पे तबस्सुम को नुमायां तो करो
बहुत उदास है ये चाँद देखने को तुम्हें
कभी ज़ुल्फ़ें रुख़-ए-रौशन से हटाया तो करो
ज़ख्म टूटे हुए दिल के जो भर नहीं सकते
थोडा मरहम ही दिलासा का, लगाया तो करो
दौरे-हाज़िर की सियासत के उसूलों की तरह
सभी से दिल न सही, हाथ मिलाया तो करो
-पुष्पेन्द्र पुष्प
आदमी होने का कुछ फ़र्ज़ निभाया तो करो
तल्ख़ हालात से दो चार है आलम सारा
सूखे होंठों पे तबस्सुम को नुमायां तो करो
बहुत उदास है ये चाँद देखने को तुम्हें
कभी ज़ुल्फ़ें रुख़-ए-रौशन से हटाया तो करो
ज़ख्म टूटे हुए दिल के जो भर नहीं सकते
थोडा मरहम ही दिलासा का, लगाया तो करो
दौरे-हाज़िर की सियासत के उसूलों की तरह
सभी से दिल न सही, हाथ मिलाया तो करो
-पुष्पेन्द्र पुष्प
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