Sunday, July 17, 2016

दोहे

बरसैं रिम-झिम बादरा, रहि-रहि पड़ै फुहार ।
देखो झूले पड़ गये, फिर निबिया की डार।।

गगन घिरी सावन घटा, गयो अँधेरा छाय ।
बाबुल की ये लाड़ली, झूले पींग बढ़ाय।।

गोरी  रोवै  गेह  में, बाहर बरसै नीर।
पिय के बिरह बिछोह में, दुर्बल भया सरीर।।

गोरी ठाढ़ी है अटा, घटा रही घहराय।
कड़के द्युति धड़कै हिया, पिय बिन रहा न जाय।।

चढ़ी अटा गोरी खड़ी, जोहै पिय की बाट।
जैसे तैसे दिन कटै, काटूँ कैसे रात ।।

अब धर धीर तु बावरी, मत हो अधिक अधीर।
बीता काल प्रवास का, समय मिलन का तीर।।

छोड़ पिया अब चाकरी, मत जा तू परदेस।
आधी रोटी प्रेम की, रहो आपने  देस ।।

बरसो बदरा आज तुम, निज अरमान बुझाय।
प्रीतम मेरे ढिंग रहे, बाहर जान न पाय ।।

जल ही जीवन है धरा, बाकी नही निदान।
धरती का अमृत यही, कहैं सभी विद्वान।।

कहै तलैया नदी से, हम तुमसे ना घाट।
सबके दिन बहुरैं कभी, समय के देखो ठाट।।

चतुर कृषक सो जानिये, जल संचय निज खेत।
ऊँच मेंड़ समतल धरा, साधे अपना हेत ।।


-राम सागर यादव,
[एच०-163, साउथ सिटी, लखनऊ]

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