Sunday, July 17, 2016

सूरज दादा

सूरज दादा
सूरज दादा
थोड़ी गरमी कम कर दो
धरती जलने लगी तवे सी
थोड़ी गरमी कम कर दो
 
पशु–पक्षी हैं कितने व्याकुल
तुम तो स्वयं देखते हो
सूख गए हैं ताल–तलैया
थोड़ी गरमी कम कर दो
 
गरम–गरम लू दिन भर चलती
घर में कैद हो गए हम
मन करता है खेलूँ बाहर
थोड़ी गरमी कम कर दो
 
पिकनिक की जब बात करुँ
तो‚ मम्मी कहती‚ गरमी है
क्यों इतने नाराज हो गए
थोड़ी गरमी कम कर दो
 
क्या गलती हो गई? कि
दादा ऐसे आँख दिखाते हो
कान पकड़ कर माँफी माँगू
थोड़ी गरमी कम कर दो

-डा० जगदीश व्योम

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर एवं अच्छी रचना के लिए बधाई। सुभाष यादव भारती

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