युग परिवर्तन की ज़िद ठाने
सुन ओ नौजवान दीवाने
जाति नस्ल रंग भाषा मज़हब
राजनीति के ताने-बाने
छिन्न भिन्न भारत की जिनकी साध पुरानी है
तुम्हें फेरना उनके मंसूबों पर पानी है
भेंट सियासत की अब चढ़नी नहीं जवानी है
सबसे पहले गेह-नेह के बंधन काटे जाते हैं
फिर जुनून और जोश परखकर बागी छाँटे जाते हैं
मुद्दों की खेती होती है राजनीति के आँगन में,
मौसम वक़्त मिज़ाज़ देख जो सबको बाँटे जाते हैं
शान्त चित्त रख राहें खोलो
कथन, कथानक, कथ्य टटोलो
निज विवेक की तुला तराशो
शब्द-शब्द तोलो फिर बोलो
अंधी-बहरी नहीं न बहकावे में आनी है
समय शेष रहते सबको ये बात बतानी है
चली जवानी जिधर, चला उस ओर ज़माना सारा है
बिना जवानी के कब गूँजा इंक़लाब का नारा है
युवा शक्ति ने हाथ मशालें लेकर खड़ी मिसालें कीं
युवाशक्ति ने लिखा क्रांति के मस्तक पर जयकारा है
युवा जोश वश में करने को
सत्ता पाकर घर भरने को
लगे भेड़िये तीन रंगों की
चूनर तार-तार करने को
सिंहासन की सीढ़ी बनती रही जवानी है
सत्ता के चोरों की अब नीयत पहचानी है
तुम्हें फेरना इनके मंसूबों पर पानी है
युवा शक्ति जो भारत के स्वर्णिम भविष्य की आशा है
जिसे ज्ञान-विज्ञान युक्त कर माँजा और तराशा है
अधिकारों की जंग बता वो उग्र प्रदर्शनकारी बन
बोल रही केवल बर्बादी की, विनाश की भाषा है
संस्कार, सुविचार भुलाकर
यौवन के मद में भरमाकर
कलम, किताबें फेंक चलो मत
हाथों में हथियार उठाकर
तुम पर ही तो टिकी आश हर हिन्दुस्तानी है
नये दौर की लिखनी तुमको नयी कहानी है
राम, कृष्ण, गौतम की गाथा फिर दोहरानी है
विश्व विजय हित हमने बोलो जाकर किससे युद्ध किया
गिरिजा, मस्ज़िद तोड़ आस्था का पथ कब अवरुद्ध किया
जगतगुरु का मान मिला जब श्रीमद्भगवतगीता दी
प्रेम, शान्ति, सद्भाव सिखाने वाला गौतम बुद्ध दिया
ज्ञान, ध्यान क्या पास नहीं है
क्यों खुद पर विश्वास नहीं है
हिंसा, आगजनी, बर्बादी
ये अपना इतिहास नहीं है
कौन योग में कहो विवेकानंद का सानी है
उठो जगो तुमको फिर धर्म ध्वजा फहरानी है
क्षत-विक्षत मानवता की वेदना मिटानी है
-डा० राजीव राज
सुन ओ नौजवान दीवाने
जाति नस्ल रंग भाषा मज़हब
राजनीति के ताने-बाने
छिन्न भिन्न भारत की जिनकी साध पुरानी है
तुम्हें फेरना उनके मंसूबों पर पानी है
भेंट सियासत की अब चढ़नी नहीं जवानी है
सबसे पहले गेह-नेह के बंधन काटे जाते हैं
फिर जुनून और जोश परखकर बागी छाँटे जाते हैं
मुद्दों की खेती होती है राजनीति के आँगन में,
मौसम वक़्त मिज़ाज़ देख जो सबको बाँटे जाते हैं
शान्त चित्त रख राहें खोलो
कथन, कथानक, कथ्य टटोलो
निज विवेक की तुला तराशो
शब्द-शब्द तोलो फिर बोलो
अंधी-बहरी नहीं न बहकावे में आनी है
समय शेष रहते सबको ये बात बतानी है
चली जवानी जिधर, चला उस ओर ज़माना सारा है
बिना जवानी के कब गूँजा इंक़लाब का नारा है
युवा शक्ति ने हाथ मशालें लेकर खड़ी मिसालें कीं
युवाशक्ति ने लिखा क्रांति के मस्तक पर जयकारा है
युवा जोश वश में करने को
सत्ता पाकर घर भरने को
लगे भेड़िये तीन रंगों की
चूनर तार-तार करने को
सिंहासन की सीढ़ी बनती रही जवानी है
सत्ता के चोरों की अब नीयत पहचानी है
तुम्हें फेरना इनके मंसूबों पर पानी है
युवा शक्ति जो भारत के स्वर्णिम भविष्य की आशा है
जिसे ज्ञान-विज्ञान युक्त कर माँजा और तराशा है
अधिकारों की जंग बता वो उग्र प्रदर्शनकारी बन
बोल रही केवल बर्बादी की, विनाश की भाषा है
संस्कार, सुविचार भुलाकर
यौवन के मद में भरमाकर
कलम, किताबें फेंक चलो मत
हाथों में हथियार उठाकर
तुम पर ही तो टिकी आश हर हिन्दुस्तानी है
नये दौर की लिखनी तुमको नयी कहानी है
राम, कृष्ण, गौतम की गाथा फिर दोहरानी है
विश्व विजय हित हमने बोलो जाकर किससे युद्ध किया
गिरिजा, मस्ज़िद तोड़ आस्था का पथ कब अवरुद्ध किया
जगतगुरु का मान मिला जब श्रीमद्भगवतगीता दी
प्रेम, शान्ति, सद्भाव सिखाने वाला गौतम बुद्ध दिया
ज्ञान, ध्यान क्या पास नहीं है
क्यों खुद पर विश्वास नहीं है
हिंसा, आगजनी, बर्बादी
ये अपना इतिहास नहीं है
कौन योग में कहो विवेकानंद का सानी है
उठो जगो तुमको फिर धर्म ध्वजा फहरानी है
क्षत-विक्षत मानवता की वेदना मिटानी है
-डा० राजीव राज
No comments:
Post a Comment