Saturday, June 25, 2016

कब कब कितने फूल झरे

-यतीन्द्र नाथ राही

कब कब कितने फूल झरे
यह उपवन को ही ज्ञात नहीं

कितने छले गए
मृगजल को इसकी खबर नहीं
कितने पथ भटके
जंगल को इसकी खबर नहीं
तन पर कितने साँप घिरे
यह चंदन को ही ज्ञात नहीं

कितने सपने टूटे
उसकी ही पाँखों से पूछो
बिछड़े कितने लोग
चिता की राखों से पूछो
कितनी गिरी बिजलियाँ
यह सावन को ही ज्ञात नहीं

-यतीन्द्र नाथ राही

No comments:

Post a Comment