-यतीन्द्र नाथ राही
युग बीते
मेरे आँगन में
कोई उत्सव नहीं मना
मौसम जाने कितने आए
पर निकले वे सभी पराए
युग युग बीते
कोई मौसम
हो न सका मेरा अपना
टूट रहे हैं अक्षर-अक्षर
अर्थों में है रहा शून्य भर
छंद साधते
युग बीते पर
गीत एक पूरा न बना
सज़ा मिली पर अवधि अनिश्चित
साँस-साँस में पीड़ा संचित
दिन पर दिन
होता जाता है
क्रूर और एकांत घना
-यतीन्द्र नाथ राही
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