Saturday, June 25, 2016

हम गलत हैं

-यतीन्द्र नाथ राही

न्याय की अंधी तुला पर
वे सही हैं, हम गलत हैं

उँगलियों के पोर घिसते
दर्द के हिमगिरि पिघलते
काँपते तटबंध
लहरों पर म्लकर ज्वार चलते
खोल दी है नाव
लंगर हौसलों के जबतलक हैं

गिरगिटों के कुलविभूषण
दूध पीते नाग काले
कालिखों के कोष भीतर
आवरण उनके उजाले
मूल्य हैं निर्मूल्य सारे
आचरण केवल प्रदर्शन
स्वार्थ इनकी प्रार्थनाएँ
ढोंग इनके दंडवत हैं

नफरतों की नागफनियाँ
दहशतों के बाँसवन ये
भेड़िए के गाँव उठते
यज्ञगंधा धूम्र बन ये
हो कोई अवरोध, भ्रम हो
या कोई मोहक छलावा
मुट्ठियों में बाँधकर
हमने रखे अपने नखत हैं

-यतीन्द्र नाथ राही    

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