Saturday, June 25, 2016

पाँखी मुँडेर के

-यतीन्द्र नाथ राही

लौटेंगे पाँखी मुँडेर के
आज नहीं तो कल

पंखों में आकाश
उड़ानों में जुनून भरकर
मंजिल-दर-मंजिल पहुँचे हैं
कहाँ-कहाँ उड़कर
किसी डाल पर रैन बसेरा
कहाँ बन गया घर
धरे चैंटुए, पाले-पोसे
बड़े हुए तो फुर्र
एकाकी मन में
इनके भी तो होगी हलचल

आसमान छोटा लगता है
जब तक लहू गरम
कस्तूरी के हिरन भटकते
पाले हुए भरम
पाँवों में पहिए
सिर पर सुख-भोगों की गठरी
प्यास समुंदर पी लेने को
लगती है पसरी
रोज नए हैं क्षितिज
नए, सपनों के राजमहल

आएँगे तो याद
कभी वे छप्पर, वे औसार
आँगन की माटी की खुशबू
ममता और दुलार
पुरवैया की छुअन
देह में भर जाती सिहरन
रस-धारों के गीत
झमाझम बरसाते सावन
प्राणों में जब रस घोलेगी
नदिया भी छल-छल

-यतीन्द्र नाथ राही

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