-यतीन्द्र नाथ राही
डरी-डरी-सी चिड़िया चहकी
मुरझाई-सी कलियाँ
उखड़ी साँस हवा मिलती है
सुबह-शाम की घड़ियाँ
चुका नेह, दीपक की बाती
क्या पूजन, क्या अर्चन
नदिया पटके पाँव गटर में
प्यास मछलियाँ तरसे
हरियाली उलझी काँटों में
गाल धुएँ से झुलसे
पूछ रहे हैं आगत का हल
कटे शीश-धड़ उपवन
कौड़ी मोल आदमी, कुर्सी-
धर्म-अर्थ-विज्ञान
बेशर्मी की हदें तोड़कर
है नंगा इंसान
आजादी का अर्थ, कटे हैं
न्याय-नीति के बंधन
क्या बाहर है, क्या भीतर है
सबकी एक कहानी
कहीं जमा है खून नसों में
कहीं आँख में पानी
लिपे-पुते चेहरे कालिख से
क्या कुंकुम, क्या चंदन
-यतीन्द्र नाथ राही
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