Wednesday, June 22, 2016

होठों पर जब गीत मचलते

-रणवीर सिंह यादव क्षितिज

होठों पर जब गीत मचलते
मन के भाव शब्द शब्द बन
अनायास ही फूट निकलते
गीतों के भी अपने सुख हैं
गाते गाते भूले दुःख हैं
अश्रु बिन्दु भी नहीं निकलते

गीतों की भाषा अपनी है
मन में आशा भी कितनी है
अब चलन ऐसी राहों पर
जहाँ भरोसा हो बाहों पर
सुख-दुःख कहीं नहीं दिखते

सबकी अलग-अलग हैं राहें
सबकी मंजिल टिकीं निगाहें
कभी राह में किया बसेरा
कभी बनों में हुआ सवेरा
हरदम रहें निरंतर चलते
जब होठों पर गीत मचलते
         

-रणवीर सिंह यादव क्षितिज

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