-बलराम सरस
सालों साल पहले
यहीं कहीं बसा था एक गाँव
जहाँ रहते थे
दादा-दादी
भैया-भाभी
नाती-पोते
पूरा गाँव जैसे
एक परिवार था सगा
बरगद,पीपल,पाखर के बूढ़े पेड़
दादा परदादा की निशानी थे
गाँव के अतीत की कहानी थे
जहां चौमासे में आल्हा
जाड़ों में ढोला
फागुन में फाग
जेठ में सारंगा का राग
गले मिलते तीज त्यौहार
प्यार भरी तकरार
सब कुछ था
पर
जबसे उस गाँव की
कच्ची दीवारें
पक्की हो गयी हैं
गली की कींच
डामर में बदल गयी है
नफ़रत घर कर गयी है
अब यहाँ मनुष्य नहीं
बुत रहते हैं
सिर्फ बुत
-बलराम सरस
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