Wednesday, December 28, 2022

ग़ज़ल

ज़ुल्म देखा जिधर गयीं आँखें
होके पत्थर ठहर गयीं आँखें 

तुमसे कैसा अजीब रिश्ता है 
याद आई कि भर गयीं आँखें 

धड़कने आँख–आँख कहतीं हैं
एक जादू सा कर गयीं आँखें 

इनकी मजबूरियाँ हीं ऐसी थीं 
प्यार करके मुकर गयीं आँखें 
            
-उषा यादव उषा

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