Wednesday, December 28, 2022

कोरे हुए विमर्श

पीड़ा के दर्पण में दिखते 
कोरे हुए विमर्श

सखी-सखा का रेला-मेला
बात हुई अब बीती 
इच्छाएँ बंजारन भटकें
सदा सबूरी जीती 
नाच रही अनथक कठपुतली 
सुधियों में उत्कर्ष 

तनी डोर पर चले जिन्दगी 
साध संतुलन मन का
बदल रही भूगोल चूक भी
टूटे हुए बदन का
उठे हाथ के यहाँ देख लो 
गिरे हुए निष्कर्ष 

आहें और कराहें फिर भी
मन्द हास मुखड़े पर 
खोला मुँह कब जाँघ उघारी 
मर्माहत दुखड़े पर 
पीड़ा जीकर सुख की खातिर 
जारी रख संघर्ष 
              

 -अनामिका सिंह

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