उम्मीदों के कैसे होंगे
भारी फिर से पाँव
धँसी आँख का जिन्दा मुर्दा
लगी पेट से पीठ
मिली प्रौढ़ता आजादी को
हुई भूख है ढीठ
बंजर धरा बिछौना लेकर
चलता सूरज छाँव
कड़वा तेल नहीं शीशी में
चुका घरों का नून
टिक्कड़ दो अँतड़ियाँ दे दो
कहे पेट दो जून
चल मुंडेर से उड़ जा कागा
लेकर कर्कश काँव
नहीं बांँधना मौला मुझको
पथवारी ताबीज़
पढ़ी-लिखी यह मुनिया पहुँची
यौवन की दहलीज़
पहन मुखौटे फिरें भेड़िये
नहीं लगेगी दाँव
-अनामिका सिंह
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