शब्द ख़ामोश
चीख़ता हुआ मौन
घुटते रिश्ते
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शाम होते ही
घोसलों में लौटती
नई उम्मीदें
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शर्मीला चाँद
ताकता बादलों से
सजती धरा
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चंचल धूप
थिरकती फिरती
यहाँ से वहाँ
रोटी का कर्ज़
बढ़ता दिनोदिन
पूरी उमर
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रिश्ते नाज़ुक
चलना रस्सी पर
निभाना इन्हें
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सागर खारा
जानती है सरिता
है अभिशप्त
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-डॉ.सुनीता यादव
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