बीतीं सदियाँ कुएँ-जगत पर
गंगी खड़ी उदास
मिटी न जोखू -जैसी प्यास
सामन्तों के छल-बल का भी
कर लें चलो यक़ीन
शोषण की गति मंद हुई कब
हुआ दीन से दीन
नाम विमर्शी और दमन है
बढ़ता रहा परास
मिटी न जोखू-जैसी प्यास
पैरहन बदल रही सत्ता के
बढ़ते रहे विकार
एक समांतर दूरी देती
शोषित के अधिकार
ऊँच-नीच की पटी न खाई
ऐसे किये प्रयास
मिटी न जोखू-जैसी प्यास
दृश्य न दीखें सद्भावों के
बन्ध्या हर उम्मीद
समरसता की भेदभाव से
मिट्टी हुई पलीद
दोज़ख़ हो माहौल भले ही
नहीं छोड़नी आस
मिटी न जोखू जैसी प्यास
-अनामिका सिंह
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