Sunday, December 17, 2017

तुम तारों-सा तो तनो बन्धु

वीणा के स्वर मधुरिम होंगे
तुम तारों-सा तो तनो बन्धु

ज्ञापन, विज्ञापन का युग है
नित नव उद्घाटन का युग है
हर ओर खड़े हैं यक्ष प्रश्न
सच के सत्यापन का युग है
जनहित में जारी होने से
पहले खुद के तो बनो बन्धु

साधना योग, छप्पर छानी
भीगी चादर, अनहद बानी
मन, वचन, कर्म की कुटिया में
बरसे कम्बल भीगे पानी
पानी में प्राण डूब जायें
ऐसे रस में भी सनो बन्धु

धरती देखो, अम्बर देखो
दुनिया के सब मंजर देखो
बाहर-बाहर जीने वालों
अपने भीतर जीकर देखो
गहरे अनुभव के छन्ने से
फिर प्रेम पात्र में छनो बन्धु

-डा० अशोक अज्ञानी

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