Tuesday, December 13, 2016

आ गई रितु आ गयी पतझार की

ख़्वाहिशों के फूल झरकर,
धूल  में  खोये   बिखरकर
हसरतों   के   पात   पीले
टीस   के  नश्तर   नुकीले
शाख़  सूनी  आस  की  है
क्यों कमी उल्लास की  है
दूर है जीवन चमन से
धुन भ्रमर गुंजार की
आ गयी रूत आ गयी पतझार की

रूप का बादल छलक कर
धूल को महका गया
और सौंधी  गंध  का  झौंका
क़दम बहका गया
साँस पर छायी ख़ुमारी,
रात दिन  थी  बेक़रारी
कामना की डाल पर थीं
कोंपलें मनुहार की
याद  आती  है
पहल अभिसार की
तन  जलाती  सावनी  बौछार  की

चूमने  नीरज  नयन  जब
चाँदनी बेकल हुई
दूधिया दिखने लगा जग
यामिनी संदल हुई
हंस थे मन के मगन सब
संग तारों  के  गगन जब
चल पड़ा था देखने को
झाँकियाँ शृंगार की
कल्पना  ने  रति
नई  साकार की।
मालती महकी शरद में प्यार की

शॉल बाहों की बनायी
गोद को  कम्बल किया
ओढ़कर हुस्ने रुबायी
गीत  को मख़मल किया
कंपकपाती शीत आयी
प्रीत ने बढ़कर  निभायी
हर रिवाजो रस्म मन से
स्वागतो सत्कार की
सर्द लम्बी  रात  ने
हद पार की
पूस गर्मायी सुबह गुलज़ार की

जो मिला है वो रहेगा
कब तलक किसको पता
जो खिला है वो झरेगा
क्यों  न  माने  मन बता
चक्र ऋतुओं का अटल है
वक़्त  तो  जाना  बदल है
बाद बारी शीत के
आती सदा पतझार की
वेदना परिणति रही है प्यार की
चाँदनी तो है सहेली ज्वार की
आ गयी आनी थी रितु पतझार की

-डा० राजीव राज

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