Tuesday, December 13, 2016

पीर बाक़ी है


दर्द  के बादल  पिघल  रहे
भाव  गंगा  में आया  ज्वार
पहनकर शब्दों  की पाज़ेब
कामना खड़ी कण्ठ के द्वार
थके बोझिल हैं स्वर के पाँव
नयन में नीर बाक़ी है
झूमकर गाने हैं कुछ गीत
अभी तो पीर बाक़ी है

अभी तो निश्छल यौवन के
नयन का स्वप्न कँवारा था
झील के दर्पण में
मासूम सुबह ने रूप सँवारा था
ख़ुशी की कलियों ने पट खोल
भ्रमर की ओर निहारा था
हृदय का कण कण थिरका था,
प्रेम की थी बज रही सितार
काल के निष्ठुर हाथों ने
न जाने क्यों कर किया प्रहार
क्रौंच के कितने जोड़ों पर
नियति का तीर बाक़ी है

अभी मीरा दीवानी ने महल की  
रीत  न  तोड़ी  है
साँवरे की बन बाबरिया
प्रीत परतीत न ओढ़ी है
तानपूरे पर गा रैदास संग
संगत ना जोड़ी है
लोक परलोक, लाज परलाज
छूटने पाया नहीं लिहाज़
जात परजात , वंश कुल ताज
त्याग कब पाया कहो समाज
मीत से छल के प्याले में
गरल गम्भीर बाक़ी है

बाँधकर अहसासों की नाव
सदा से संवेदन तट पर
खोलते रहे हृदय के द्वार
आह की नाज़ुक आहट पर
न रक्खा स्वाभिमान गिरवी
कभी दौलत की चौखट पर
चाह में सुविधाओं की हम,
प्रेम का कर न सके व्यापार
रोशनी ने मुँह फेर लिया
दूर तक फैला है अँधियार
बुझी है बाती पर लौ की
अभी तासीर बाक़ी है
झूमकर गाने हैं कुछ गीत
अभी तो पीर बाक़ी है

-डा० राजीव राज

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