आज के महाभारत के
दारिद्रय सहानुभूति के
एक पात्र हो
तुम एकलव्य
जो भी अर्जित किया
स्वोपार्जित परिश्रम था
और जब एक कल्पना का
प्रत्यक्ष सच से परिचय हुआ
तब तुम्हारे गुरु ने
शिक्षा के पट बंद कर
तुम से स्वार्जित शक्ति
गुरु दक्षिणा में माँगकर
आहुति कर दिया तुम्हें
सिर्फ परम्पराओं की भेंट
मानकर
अहंकार के आच्छादित हृदय ने
अपाहिज बना दिया
तुम्हें एकलव्य
तुम वो गूँज थे
जिसकी धमक युगों तक
ध्वनित होती
तुम आज भी वहीं खड़े हो
अपनी पहचान के साथ
कुछ नहीं बदला भाई
उस महाभारत से
प्रस्तुत महाभारत तक
तुम्हारी यथास्थिति के लिए
ज्यादा शक्तिशाली और
मजबूत हुए हैं द्रोणाचार्य
-डा० शिव यादव
दारिद्रय सहानुभूति के
एक पात्र हो
तुम एकलव्य
जो भी अर्जित किया
स्वोपार्जित परिश्रम था
और जब एक कल्पना का
प्रत्यक्ष सच से परिचय हुआ
तब तुम्हारे गुरु ने
शिक्षा के पट बंद कर
तुम से स्वार्जित शक्ति
गुरु दक्षिणा में माँगकर
आहुति कर दिया तुम्हें
सिर्फ परम्पराओं की भेंट
मानकर
अहंकार के आच्छादित हृदय ने
अपाहिज बना दिया
तुम्हें एकलव्य
तुम वो गूँज थे
जिसकी धमक युगों तक
ध्वनित होती
तुम आज भी वहीं खड़े हो
अपनी पहचान के साथ
कुछ नहीं बदला भाई
उस महाभारत से
प्रस्तुत महाभारत तक
तुम्हारी यथास्थिति के लिए
ज्यादा शक्तिशाली और
मजबूत हुए हैं द्रोणाचार्य
-डा० शिव यादव
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