Saturday, August 20, 2016

आप का कैसा मुकद्दर

आप का कैसा मुकद्दर हो गया
सिर ढँका तो पाँव बाहर हो गया

दर्द सारे ग़म के दरिया में बहे
जिन्‍दगी का दिन कलेण्‍डर हो गया

हादसों के बीच जीना किस तरह से
खून का कतरा समन्‍दर हो गया

भीड़ में खोया हुआ है आदमी
भीड़ से निकला सिकन्‍दर हो गया

दौर है बदलाव का ऐसा 'उपेन्‍द्र'
कल का काँटा आज खंजर हो गया


-मदन मोहन उपेन्द्र

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