-रामनारायण रमण
धरती हुए अम्बर हुए
लोग हमसे पूछते हैं
क्या बतायें
आदमी के भाव
ईष्र्या द्वेष के, संताप के,
पाप के कितने तरीके
प्रकट होने के
मगर वे नही दिखते
कभी अपने आप के
दूसरों के वास्ते-
ये आदमी खंजर हुए
बहुत छलनायें दिखी हैं
हर उजाले में
जिसे हम प्रेम कहते हैं
उसी मे रमे रहते हैं,
नदी से बह नहीं पाते
फरेबों से भरे नद हैं,
अंधेरे हैं
जहाँ हम थमे रहते हैं
जो लगे थे देवता
वे बदल कर पत्थर हुए
भीड़ से बचना हमेशा
खोजना एकान्त
जीवन जहाँ खिलता है
हमें आराम मिलता है,
तसल्ली भी, दिलासा भी
नई आशा, नई भाषा
कि अपने रास्ते पर-
एक मुकाम मिलता है
कह नहीं पाते-
कि क्या हटकर हुए
-रामनारायण रमण
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