Sunday, July 31, 2016

चुप रहना

-रामनारायण रमण

रचनाओं से
खेल रहा है मन सैलानी                
चुप रहना

इन्द्रधनुष कुछ नहीं
किसे मालूम नहीं
पानी की बूँदों पर किरणें तारी हैं,
धीरे-धीरे दुनिया
बदली जाती है
बदलाहट के बीच-बीच चिनगारी हैं
आँख उठाकर
देख रहा आकाश गुमानी              
चुप रहना

एक टाँग पर खड़ा
कुकुरमुत्ता मुस्काता
कूड़ा करकट जहाँ वहीं उग आता है,
बच्चों की छतरी से-
लेकर कैप सदृश
खाने के पकवानों तक घुस जाता है
नहीं चलेगी
बेमतलब की बात पुरानी              
चुप रहना

कितना पानी बहा
नदी वतुल में है
सागर, पर्वत, सूरज, चाँद-सितारे हैं,
जाड़ा-गर्मी-बरसातें-
मधुमास मिलन
पतझड़ के विग्रह की लगी कतारें हैं
वातायन से
फिर लौटा अद्भुत विज्ञानी            
चुप रहना

-रामनारायण रमण

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