Saturday, July 9, 2016

दोहे

इंद्र धनुष सतरंग के, शोभित गगन निशान।
रमन धरा ओढ़े यहाँ, सतरंगी परिधान।।

बोल सुनाई दे रहे, झींगुर दादुर मोर।
रमन छिपे अब तक रहे, शोर करें चहुँ ओर।।

कल-कल ध्वनि सरिता करे, टूट रहे तटबन्ध।
रमन सजनियां तोड़ती, दुरी के अनुबन्ध।।

शाम समय जल्दी करें, भोजन अब श्रीमान।
रमन देर होते गिरें, पंखी कीट अथान।।

     
-राम नरेश रमन
 [मोठ, झाँसी]

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