इंद्र धनुष सतरंग के, शोभित गगन निशान।
रमन धरा ओढ़े यहाँ, सतरंगी परिधान।।
बोल सुनाई दे रहे, झींगुर दादुर मोर।
रमन छिपे अब तक रहे, शोर करें चहुँ ओर।।
कल-कल ध्वनि सरिता करे, टूट रहे तटबन्ध।
रमन सजनियां तोड़ती, दुरी के अनुबन्ध।।
शाम समय जल्दी करें, भोजन अब श्रीमान।
रमन देर होते गिरें, पंखी कीट अथान।।
-राम नरेश रमन
[मोठ, झाँसी]
रमन धरा ओढ़े यहाँ, सतरंगी परिधान।।
बोल सुनाई दे रहे, झींगुर दादुर मोर।
रमन छिपे अब तक रहे, शोर करें चहुँ ओर।।
कल-कल ध्वनि सरिता करे, टूट रहे तटबन्ध।
रमन सजनियां तोड़ती, दुरी के अनुबन्ध।।
शाम समय जल्दी करें, भोजन अब श्रीमान।
रमन देर होते गिरें, पंखी कीट अथान।।
-राम नरेश रमन
[मोठ, झाँसी]
No comments:
Post a Comment