Tuesday, July 26, 2016

जग को समझ नयन भर आये

-डा० बैरिस्टर सिंह यादव

धरती भार अमर बन बैठे, परहित सपन न देखे
जनपथ पर काँटे बोते वे सर्व सुखी हम देखे
एकाकी कुलदीप सुअन, नवयुवक काल ने खाये
जन प्रिय देशभक्त ज्ञानी, इस जग में जात सताये
अद्भुत विधि विधान निर्णय को, देखत सिर चकराये
जग को समझ नयन भर आये।

मित्र कुटुम्बी सम्बंधी सब रहे सदा ही घेरे
स्वार्थ साधकर हुए किनारे, दुख में मिले न हेरे
जीवन भर अनुशासन का ही सबको पाठ पढ़ाया
अपनो से पालन करने में निज को असफल पाया
दीपक तले अँधेरा लखकर सदा रहे पछताये
जग को समझ नयन भर आये।

शासक और प्रशासक देश के सेवक सभी कहाते
ईश्वर अल्ला की शपथें ले कर्मक्षेत्र में आते
चाहे देश रसातल जाये अपना घर भरते हैं
त्राहि त्राहि कर जनता रोती अंध बधिर बनते हैं
नंगी भूखी गाय भेड़ सी जनता कहाँ को जाये
जग को समझ नयन भर आये।

दो रोगों से देश ग्रसित है किया खोखला इसको
एक मशीनी और दलाली दुखी किया जन जन को
कृषक मँजूरा भूखे नंगे अभीशापित जीवन है
इसकी खबर न कोई लेता सबको अपनी धुन है
कहीं सुधार किरण ना दिखती धीरज कौन बँधाये
जग को समझ नयन भर आये।

-डा० बैरिस्टर सिंह यादव

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