Friday, July 1, 2016

महँगाई का दामन पकड़े

महँगाई का दामन पकड़े भूख सिसक कर रोती है
चाँद हुआ रोटी का टुकड़ा दाल का दाना मोती है

बनिये का पर्चा पर्वत से ज़्यादा भारी लगता है
बोझ गृहस्थी का मेरी माँ जाने कैसे ढोती है

जीवन नभ पर तम छा जाता महँगाई के मौसम में
सूरज जैसी एक अठन्नी बटुए से जब खोती है

सर पे रख आशा का छप्पर आँखों में उम्मीद जगा
कम होगी महँगाई कहकर चैन से दिल्ली सोती है

उनके जादू भरे आंकड़ों पर मत जाना 'मीत' कभी
निर्धन के चेहरे पर हर इक चीज़ की क़ीमत होती है

-मनीष मीत

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