प्यास की पीड़ा प्यासा जाने नदिया-धारा क्या जाने
क्या होते हैं पाँव के छाले धूप-शरारा क्या जाने
कितना नूर छुपाये खुद में उनको ये मालूम नहीं
अपनी रौनक अपना जलवा चाँद-सितारा क्या जाने
अपने आँगन की फुलवारी अपने गुलशन की खुशबू
जो फिरता है मारा-मारा वो बंजारा क्या जाने
उन हाथों से पूछो जाकर जिसने बोझ उठाये हैं
बनता है घर आँगन कैसे ईंटा-गारा क्या जाने
कलियों फूलों का हत्यारा खुशबू रंगों का कातिल
इक माली ने कैसे कैसे बाग़ संवारा क्या जाने
-मनीष मीत
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